Sunday, March 3, 2024

Innocent Journey


यही कोई 1972-73 की बात है। मैं मेरी मां के साथ ननीहाल (मण्डरेला) गया हुआ था। उस समय मैं चौथी कक्षा में था। मैं अपने आप में होसियार खान था और लोग भी समझते थे क्यों नहीं क्योंकि अध्यापक लोग भी कहते थे। ये मयी-जून की बात है और जुलाई में स्कूल खुलने वाले थे और मुझे गांव वापस आना था। मां नाना से कहने लगी कि मैं यदि अकेला गांव चला जाता हूं तो वह दस पन्द्रह दिन ओर रह लेगी। हमारी गरीबी उस समय चर्म पर थी। ज्यादातर समय ननिहाल में ही कटता था। हां तो इधर नाना जी ने प्रशंसा करनी शुरू कर दी कि ये तो मास्टर है चुरू कोनसा दूर है सिधी झुंझुनूं से बस जाती है यहां से हम बैठा देंगे । लो जी अकेले आने की तैयारी शुरू हो गई। नानी ने मोची से खाल के जूते पांच रुपए में जबरदस्त दिला दिए। एक LIC की बैग नाना ने दे दी। हमारी यात्रा मण्डरेला से झुंझुनूं तक तो सुखद रही । झुंझुनूं में बस वाले ने गांधी पार्क पर उतार दिया ओर मुझे बस स्टैंड तथा बस स्टेशन में फर्क मालूम नहीं। मैंने बस से नीचे उतरते ही पूछा बस स्टेशन किधर है तो लोगों ने स्टेशन बताना शुरू कर दिया ओर मैंने उधर चलना शुरू कर दिया। नये जूतों ने पैर काटना शुरू कर दिया। ५००-६०० मिटर चला होगा कि पैरों में खून आने लगा। मैंने जूते हाथ में ले लिए। तब यह झूंझूंनू वाला रोड़वेज डिपो नहीं था। सड़क किनारे अच्छे-अच्छे पेड़ थे। मुझे मालूम नहीं मैं कहां था शायद डिपो से थोड़ा आगे पीछे ही था । दो युवक सामने से साईकिल पर आ रहे थे मेरा उदास चेहरा देखकर बोले, कहां जा रहे हो। मैंने कहा बस स्टेशन। उन्होंने पुछा, कहां जाना है ?मैंने कहा चूरू, वो बोले इधर तो रेल गारी जाति है। चलो आपको बस में बैठा ते हैं।

      तब उन दोनो ने मुझे साइकिल पर बैठाया और आप दोनो ने सैकिल चला के झुंझुनू ताल बस स्टैंड पर आए। झुंझुनू से चुरू आने वाली बस की तलास कर के मुझे उसमे बैठाकर टिकट भी दिलाए और ड्राइवर से कहा की इस बचे को चुरू उतर कर धीरासर वाली बस मैं बिठा देना।वो ड्राइवर भी अच्छा था। उसने चुरू बस स्टैंड पर मुझे उतर कर धिरासर वाली बस मैं बैठा दिया और ड्राइवर से कहा की जसरासर छोड़ देना। तब मैं घर पहूँचा और मेरी दादी बहुत खुश हुई।

ऐसे भले आदमी आजकल कहां है। हो भी सकता है पर मिलना बहुत मुश्किल है। मैं आज भी उनको कफी दुआएं देता हूं। वो जहां कहीं भी हो भगवान उनको खुश रखे।